ये जेएनयू है यहाँ की फजा सुहानी है
हर एक दिल पे यहाँ छाई शादमानी है
कहीं पपीहा तो बुलबुल कहीं चहकता है
घड़ी घड़ी तो यहाँ साज़ बजता रहता है
हर एक खूबी में अपना चमन निराला है
जभी तो इसका जहाँ भर मे बोल बाला है
ये ऐसा दरिया है जिसमें सदा रवानी है
क़दम क़दम पे यहाँ यारों कामरानी है
ये जेएनयू है यहाँ की फजा सुहानी है
ये गुलमोहर वो अमलतास की कतारें हैं
के जैसे सुबह-ए- बनारस में लालाजारें हैं
यहाँ पे छाई है शाम -ए-अवध सी रंगीनी
हर एक लम्हा है मौसम मे एक नमकीनी
अभी है दुप, तो कब छाओं किस ने जानी है
यहाँ के लोगों की, क्या खूब जिंदगानी है
ये जेएनयू है यहाँ की फजा सुहानी है
बगैर वक्त के बादल यहाँ बरसते हैं
न जाने कितने मुक़द्दर यहाँ संवरते हैं
यहाँ पे देखो सभी रंग के हैं फूल खिले
ये कह रहे हैं , यहाँ पे तो दिल से दिल हैं मिले
कहीं गुलाब कहीं पे तो रातरानी है
ये रीत अपने चमन की बड़ी पुराणी है
ये जेएनयू है यहाँ की फजा सुहानी है
यूँ दिलफरेब हैं दिलकश सभी नज़ारे हैं
के जैसे धुप की किरनें या माहपारे हैं
वो "गंगा ढाबे" पे हर शाम एक मेला है
हज़ार यादों का मरकज़ वो मजनू टीला है
कहीं अदा है अदा में तो लंतरानी है
हर एक पल में यहाँ इक नई कहानी है
क़दम क़दम पे यां दिलबर हैं, मनचले भी हैं
सुरूर, रक्स के आलम में रतजगे भी हैं
ज़रा सी धुन पे थिरकता है अंग अंग यहाँ
हज़ार रूप हैं बिखरे हज़ार रंग यहाँ
हरा है लाल, गुलाबी है जाफरानी है
खशी में डूबी अदाएँ हैं नौजवानी ही
ये जेएनयू है यहाँ की फजा सुहानी है
यहाँ तो अपने, पराये भी साथ रहते हैं
हमेशा पयार, मोहब्बत की बात करते हैं
ये अपनी धुन में हर इक सुबह-व- शाम रहते हैं
अँधेरी रात में तारों का काम करते हैं
जिधर भी जाए नज़र आम जौफशानी है
"वसी" ये हमपे तो कुदरत की मेहरबानी है
ये जेएनयू है यहाँ की फजा सुहानी है।
जेएनयू और दूसरी universities में अगर किसी हद तक यकसानियत है तो बहुत जियादा फर्क भी है. और वोह चीज़ जो जेएनयू को सब से मुमताज़ और अलग करती है वो है यहाँ का खुशगवार मौसम, पुरसुकून माहौल, खुशरंग फजा, दिलफरेब मंज़र , दिलकश नज़ारे..... ख़ुद जेएनयू एक ऐसी ;पुर्काशिश ,intelectual, और खुबसूरत हसीना है जिसने अपनी जुल्फों के फंदे में न जाने कितनों को बाँध रखा है. वरना तो आख़िर किया वजह है के विद्द्रोही (एक ओल्ड स्टुडेंट ) जैसे लोग एक उम्र गुजारने पर मजबूर हैं . जभी तो एक बार किसी ऑटो ड्राईवर ने विद्द्रोही से बहार जाने का रास्ता पूछा तो उनका जवाब था
" मैं भी 25 साल से वही तलाश कर रहा हूँ ". for more read my novel based on jnu, in both Urdu and Hindi languages.
in Urdu and Hindi.
wasi bastavi
Email. wasijnu@gmail.com
Friday, January 30, 2009
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क्या खूबसूरत चिट्टा (ब्लॉग) हैं आपका मियाँ! मजा आ गया! :):):):):):):)
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